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आशा..



आज पहली बार मैंने

दिल को रोते देखा था

किसी अपने को आज मैंने

खुद से बिछड़ते देखा था

एक पल का उन्माद था या

ज़िन्दगी का बोझ लेकिन

ज़िन्दगी की आशाओ को

मैंने उस दिन खोते देखा था

कंकड़ फेंकी चप्पल फेंकी

और गहरायी नापी थी

क्या मेरे मरने की खातिर

इतनी ऊंचाई काफी थी?

चप्पल के गिरने में मैंने

खुद को गिरते देखा था

खून से लथपथ रूह को अपनी

मैंने तड़पते देखा था

मौत का मंज़र देख सामने

खुद को सिहरते देखा था

आज पहली बार मैंने

खुद को मरते देखा था

ज़िन्दगी को ज़िन्दगी का

गला घोंटते देखा था

चलता फिरता मांस का खुद को

पुतला बनते देखा था

खुद को अपने डर से डरकर

भाग जाते देखा था

मेरे डर को मैंने अपना

अक्स बनते देखा था

फिर कुछ नन्ही सी किरणों को

मुझको छूते देखा था

ज़िन्दगी की नई आशा को

सांस लेते देखा था

मैंने खुद को फिरसे

इंसान बनते देखा था

मेरे अक्स को फिर से अपने

घर पर लौटते देखा था

डर का चोगा उतार के फिर से

पहले सा बनता देखा था

नयी आशा नए आगाज़ के साथ

मैंने खुद को जीते देखा था
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quite intense, yet superb lines...
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thank you very much gurjyot ji..

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shared Aug 23, 2016 in Poem by singhtanisha756
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