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कितने है खिलौने, पर दिल बहलता क्यूँ नहीं, 

दौड़ता है ख्वाबों के पीछे, बेलगाम दिल ठहरता क्यूँ नहीं. 

झुकता है गैरों को उठाने को मगर, 

जब वो पाँव खिंचे तो दिल संभलता क्यूँ नहीं. 

झाँक लेता है दूर से ही फलक का नज़ारा, 

अपने ही आंगन में दिल टहलता क्यूँ नहीं. 

सारे जहाँ की सुलझाता है उलझने, 

ख़ुद की उलझनों से दिल निकलता क्यूँ नहीं. 

बहोत शोर हैं ख़ामोशीयों का इस दिल में, 

सबब-ए-दर्द, दिल उगलता क्यूँ नहीं. 

लहू आँखो से छलकते हैं औरों के भी, 

कम-ज़र्फ़ एक तुम्हारा ही दिल पिघलता क्यूँ नहीं.

कितने है खिलौने पर, दिल बहलता क्यूँ नहीं, 

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Andaze bayan kuch esa ho to har koi shayar banne ka khwab dekhega... smiley

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NICE POEM....VERY CREATIVE WORK....
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Shukriya Shagufta ji.
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Shukriya Kshitij bhai.
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!! NIce poem...well penned
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Thanks Ritikaji.

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