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बच्चा तो बच गया पर अनिल नही. था तो वो इंसान ही. पर शायद इंसान और राक्षस की दीवार बहुत पतली होती है. पुलिस मे रिपोर्ट हुई,  पर जाँच मे उसे मेंटली अनस्टेबल पाया गया. और साल भर के लिए रिहॅबिलेशन सेंटर भेज दिया गया. वो लौटा तो नफ़रत भुलाकर,  पर शायद राक्षस  बन जाने की ग्लानि उससे बर्दाश्त नही हुई. लोगो ने उस बात को भुला दिया था, पर एक साल का ट्रीटमेंट अनिल की यादें नही मिटा पाया. उसे शर्म थी अपने किए की और उससे ज़्यादा इस बात की अब वो चाहे भी तो लोगो की नज़र मे फिर इंसान नही बन पायगा.

वो घर में आया और अंदर से दरवाज़ा बंद कर लिया. वो दरवाज़ा वापस खुला नही.

कई दिन बाद जब दरवाज़ा तोड़ा गया तो पूरे कमरे मे बदबू थी. कमरे के बीचो बीच उसकी लाश थी. ऐसा लगता था आवेश मे शरीर को चाकू से इतना घोंपा…. शायद  अंदर का दर्द मिटाने के लिए.

माँस की चिथड़ो से भरा शरीर किसी राक्षस का जान पड़ता था..

“जाने कहाँ गए वो दिन जब एक इंसान इंसान था. जाने कहाँ गए वो दिन जब वो जिंदा था. अब न जिंदा लाश जिंदा थी, न वो राक्षस न वो इंसान”

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