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रोज़ सुबह उसे अपने दरवाज़े पर पेन्सिल या स्केच पेन या चॉक से बनी  आकृति मिलती. एक सड़ी हुई शक्ल और उसके बीच मे लिखा- राक्षस. अनिल जब भी ये देखता तिलमिला जाता. और बच्चे हँस हँस के पागल होते रहते. यही चीज़ उसके ऑफिस से लौटने पर होती. वो रोज़ मिटाता और रोज़ नया पता

एक दिन अचानक उसने बच्चो की कारिस्तानी देख ही ली पर उसके कुछ करने से पहले ही वो भाग गये.

पर आख़िरकार एक दिन एक बच्चा दुर्भाग्यशाली रहा. भागता हुआ सीधा अनिल से जा टकराया. अनिल ने पहले उसे देखा फिर दरवाज़े पर बनी आकृति को. और फिर उसका सर दीवार पर पटक दिया. शायद यहीं उसकी इंसानियत का अंत हो गया.

लहूलुहान होकर बच्चा अस्पताल मे पड़ा था. लोग समझ नही पा रहे थे की पहले अनिल को घेरे या फिर बच्चे को देखे. फिर दोनो काम बाँट लिए गये. शायद अनिल को भी आभास हो गया था की उसने हद पार कर दी थी. वो कई बार अनिता की मौत को अपने किए के बचाव के रूप मे देखने का प्रयास कर रहा था पर हर बार अंतर्मन से यही जवाब मिल रहा था की- ‘आज तू सचमुच का राक्षस हो गया है’.

 

लोगो ने आकर उसे बहुत सुनाया. पुलिस की धमकी भी दी पर उसे वो दुख इन लोगो से नही पहुंचा. उसने लोगो से वास्ता रखना बहुत पहले ही छोड़ दिया था. पर सारी दुनिया का दर्द एक तरफ और मुकेश की वो बात एक तरफ.

ग्लानि के वातावरण से निकलने के लिए वो मुकेश के घर गया. जब मुकेश को पता चला तो उसे दुख हुआ.. बच्चे के लिए.

बोला-“ तू तो आतंकवादी के काम कर रहा है. ग़लती किसी और की, सज़ा किसी और को. और अनिता की मौत तो एक्सीडेंट थी…. इतनी नफ़रत कहाँ से लाया”

अनिल से कुछ बोलते ना बना. भले ही एक मन से वो इसे अनिता की मौत का बदला समाज रहा हो पर उसे ना सुकून मिला था ना खुशी. उसका मन तो और बैचैन हो गया.

मुकेश बोला- “मेरे दो बेटे है. चाहे तो उनका भी सर पटक दे दीवार पर. और अगर  तब भी खुशी ना मिले तो हमारा भी सर फोड़ देना क्यूंकि हम ने उनको पैदा किया है”

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