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वो खिड़कियों पर खड़ा हुआ पुरानी स्मृतियाँ याद कर मुस्कुराने का यत्न कर रहा था. अचानक से खिड़की से टकराती वस्तु सीधा उसको आकर लगी. पहले तो अनिल तिलमिलाया. उसका ध्यान भंग हो गया था. देखा तो वो बॉल थी. खिड़की के बाहर झाँका तो बच्चे टकटकी लगाए खिड़की की ओर देख रहे थे. क्रिकेट खेलते हुए बॉल अक्सर घरो मे चली जाया करती है पर आज अनिल को इसमे भी बच्चो की साज़िश नज़र आई

बच्चो ने उपर से आवाज़ लगाई- “अंकल बॉल”

अनिल सीढ़ियों से उतारकर नीचे आया. कडक कर पूछा- “क्या हुआ?”

एक लड़का सामने आया- “अंकल सॉरी. अगली बार नही आएगी. अभी दे दो.”

“सॉरी” शब्द सुनकर अनिल भड़क उठा. रह रह के बाते याद आने लगी

“सॉरी…सॉरी..” बॉल को उसके मुंह पर दे मारता है. “आई आम अल्सो सॉरी.”

टेनिस की बॉल थी. चोट तो क्या लगती पर दर्द के मारे चीख निकल पड़ी.रोने लगा. लेकिन अनिल को कोई फ़र्क नही पड़ा. तब एक दूसरा लड़का रोते हुए लड़के को उठाते हुए बोला- “अंकल आप इंसान हो या राक्षस”

“राक्षस…. हाँ मैं राक्षस हूँ. पर पता है क्यूँ. पर पता है क्यूँ.. क्योंकि साला इस दुनिया मे इंसानियत की कोई कीमत नही है.!!”

“जाने कहाँ गए वो दिन जब मैं इंसान था. जाने कहाँ गए वो दिन जब मैं.....जिंदा था. अब न जिंदा हूँ न इंसान हूँ”

 

वो तो शुक्र हो मुकेश का जो उस समय अनिल से मिलने आ गया और अनिल उसके साथ अंदर चला गया. पर इस वाकये के बाद अनिल को नया नाम मिल गया… राक्षस. बच्चो ने उससे और उसने बच्चो से नफ़रत पाल ली.

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