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पूरा दिन बहुत बेचैनी मे बीता ऑफिस मे. जब भावनाओ का बोझ सहा नहीं गया तो मुकेश को फोन लगाया

“आज ऑफिस टाइम मे कैसे फोन किया?” मुकेश ने छेड़ते हुए कहा

“बस ऐसे ही यार बात करने की इच्छा हुई”. अनिल असली बात छुपा गया

“मैं समझ सकता हूँ अनिल. भाभी की याद….”

“वो बात नहीं है मुकेश. मेरे अंदर का इंसान कहीं खो गया सा लगता है. ऐसा लगता है अनिल इंसान नही है, अनिल राक्षस है.”

“क्या हुआ? क्या हो गया?”

“कुछ नहीं…” रुंधे गले से बोला..”बहुत अकेलापन लगता है यार. अब अकेलापन सहा ना जाता. तू भी घर पे आता नहीं है. कभी कभी तो अपने दोस्त का हाल आकर देख जा”

मुकेश को पता था अनिल की बात झूठ है. वो परसो ही उसके घर गया था. हाँ पर ऐसे वक़्त में इंसान को हर वक़्त साथ की ज़रूरत होती है

“ठीक है अनिल मैं आज आऊंगा घर”. मुकेश ने ये कहकर फ़ोन रखा. शाम को ऑफिस से अनिल जल्दी निकल गया. उसका मन आज काम मे नही लग रहा था. घर पहुंचकर गहरे सन्नाटे मे प्रवेश किया. ऐसा लगता था कमरे मे कोई नही है. उसे अपने होने का भी एहसास नही होता था. उसकी नज़र पड़ी खिड़कियो पर, जो बंद पड़ी थी. हवा की आशा से उसने खिड़कियों की कुण्डी खोलकर उन्हे बाहर की ओर खोल दिया. उसने सुबह खिड़कियों के पर्दे निकल दिए थे.

“तुम थी तो दुनिया मे रंग था. अब इन रंग बिरंगे पर्दो का क्या करना” ये कहा था अनिल ने सुबह.

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