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अनिल सकते में था. काफी देर तक कुछ कह नहीं पाया. फिर कुछ हिम्मत जुटाकर बोला-“पर ये हुआ कैसे?”

“देखने वालो का कहना है की अनिता जी के रास्ते मे कुछ बच्चे आ गये थे बीच सड़क पर खेलते हुए. उन्हे बचाने के चक्कर मे उसने गाड़ी मोडनी चाही पर वो सीधा इस खंबे से टकरा गयी”

“उन बच्चो का क्या हुआ?”

“कुछ नही. वो तो खेलते खेलते निकल गये.”

ये सुनते ही अनिल का खून खौल उठा.” बच्चे, जिसकी चाह ने अनिता को जीते जी जीने नही दिया और अब…. मार दिया!! और उनको सज़ा….. कुछ भी नही”

इस पूरे समय मे अनिल के साथ सिर्फ़ उसका दोस्त मुकेश था. दोनो एक ही साथ पढ़ा करते थे और उनके संबंध बड़े अच्छे थे. सांत्वना देते हुए मुकेश बोला-

“सुन अनिल, जो   हो गया उसे ना तू बदल सकता है ना मैं.”

“छोड़ यार. मैं वो इंसान नही है जो इन बातो से अपना मन बहला ले. जाने क्यूँ बच्चो के नाम से  चिढ़ हो गयी है. मुझसे बर्दाश्त नही हो रहा है ये ख़ालीपन. मुझे ये  ख़ालीपन दूर करना है”

 

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