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बिना जोगी बने भी होता है मन मलंग
संसार में रहकर भी मुक्त होता जीवन तरंग...
नहीं जरुरत  गेरूआ की,जब हो मोह भंग
जगमग दुनियां में भी भाता बैराग का रंग.....
किसी ग्रंथ में नहीं छुपी साधना की परिभाषा
सारे रिश्ते बता देते है स्वार्थ की लोभी भाषा...
वन में भटकने पर नहीं मिलता ज्ञान का सार
घर-आंगन में दिख जाता जागृति की पुकार....
ढोंगी होते हैं वो,जो करते धर्म का भ्रष्ट व्यापार
पहन चोला साधु का,जोड़ते भ्रमजाल का तार...
अपने मतलब की आर में बनते हैं ये दुशासन
नारी का कर अपमान,बैठते नोटों के सिंहासन।
              अनुगुंजा
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very well penned... :)
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Thank you so much....please watch my short films on YouTube. i make my films on very ordinary mobile phone camera.
commented by
nice poem

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