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मेरी नानी थी मेरी सहेली.....कभी वो सुनाती अपनी बचपन की कहानी ,तो कभी उसे जीवन की वास्तविकता रहती बतानी।मेरी हर लेखनी को वो सुनती थी बहुत ध्यान से और देती अपनी प्रतिक्रिया पूरे रूझान से।
मेरी पेंटिंग में वो खोज ही लेती थी कला के रंग और बताती जिन्दगी है गिरकर उठने का तरंग।
जब बीमारी ने उसे लपेटा...तो फिर उसने सोचने-समझने का साथ छोड़ा।चुपचाप बस मुझे निहारती रहती....जैसे जीवन की अंतिम गाथा अपने नयनो से सुनाती रहती।हमेशा अपने हाथों से पकड़े रहती पलंग का कोना...शायद इस दुनिया को छोड़ उसे नहीं था जाना।मेरी एक आवाज पर सिलवट पड़ जाती थी उसके माथे पर.....बंद आँखों से भी पहचान जाती मेरी आवाजो को।
अचानक 2013 साल का वो दिन आया...जब मेरी नानी चल पड़ी अपनी अंतिम यात्रा पर।बहुत कष्ट हुआ था उसे शरीर छोड़ने में...बार बार सांसें जाकर आती थी,पर एक झटका लगा और गई सांसें कभी लौटकर नहीं आई।
आज भी मेरे अंदर जिन्दा है मेरी नानी.......
उसकी बातें आज भी लगती है गुड़िया की कहानी।
जाने वाले कभी लौटकर नहीं आते पर उनकी यादें हमसे कभी जुदा न हो पाती।अनुगुंजा
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It's true, we just can't forget the ones who have left us.
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Very emotional write up.
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Thank you so much....मेरी लेखिनी को आप लोगों ने पसंद किया,लेखक के पास सिर्फ शब्द होते हैं अपनी भावनाओं को प्रस्तुत करने के लिए।आप लोगों से अनुरोध है कि कृपया YouTube पर मेरी short films देखे।धन्यवाद।
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very well expressed....emotions....loved it

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