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रास्ते के हर नज़ारे से उस दिन हमे प्यार हो गया था,
उस शाम मेरा हर इंतज़ार मुक्कमल हो गया था।
वो बार बार खुद को सवारने की कोशिश करना,
हवा के हर झोके को जैसे मुझसे ही प्यार हो गया था।
बार बार घड़ी की सुई देखकर ,थोडा बेवजह बेचैन हो जाना,
वक़्त का हर लम्हा  जैसे युही बेसब्र हो गया  था।
वो एकदम से सब रुक जाना, हर शोर खत्म हो जाना ,
उसके आते ही जिस्म का हर कतरा जैसे धड़कन हो गया था।
हर कोशिश मेरी आँखों की उसे पढ़ने की, उसे समझने की,
अल्फाज़ो का जैसे मेरे ,हर मायना खत्म हो गया था।
जब बारी आई उनके रुखसत होने की,
दिल पगला गम में युही मरने को आमादा हो गया था।
कुछ चंद लम्हों की बेखुमारी का असर था,
अब उस एक शाम की कहानी में तुषीर, हर रात का चैन जैसे हराम हो गया था।
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superb piece...

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