This website is in read only mode. To be the part of New YoAlfaaz community, click the button.
+4 votes
1.9k views
shared in Ghazal by
मैं लिखता हूँ तो मुझे कमज़ोर ना समझ,
मैं अकसर अल्फाज़ो के तीर बनाता हूँ ।

इसे जर्रे भर की कलम ना समझ,
मैं अकसर इसे ही शमसीर बनाता हूँ ।

जब छा जाती है मन पर उदासी तो मैं एक किरदार बनाता हूँ,
फिर समा के उसमे खुद को मैं फिर से तेरी तसवीर बनाता हूँ ।

कभी मंदिर में भजन तो कभी जलसे में हम्द बनाता हूँ,
मजहब नहीं मेरा कोई मैं किसी को साधु तो किसी को पीर बनाता हूँ ।

कभी किसी टूटे दिल की सदा तो कभी किसी की महबूबा को हीर बनाता हूँ,
मैं इसी तरह अकसर इश्क़ के कद्रदानों की तकदीर बनाता हूँ ।

मेरी क़ीमत ना पूछ तू किसी सौदागर से जाकर "ज़ेद"
मैं तो गरीबी में ही किसी को रहीम तो किसी को कबीर बनाता हूँ ।
commented by
wow....what an amazing piece

Welcome to YoAlfaaz :)
commented by
very well penned...
commented by
Thank u so much

Related posts

+3 votes
0 replies 59 views
+4 votes
0 replies 49 views
+5 votes
0 replies 52 views
+8 votes
1 reply 91 views
+4 votes
0 replies 45 views
+5 votes
0 replies 52 views
+3 votes
0 replies 372 views
+4 votes
0 replies 106 views
Connect with us:
...