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मुशायरे मे शायरी सुनाने से कतराता नहीं मगर ,
मुश्किलें मेरी बढ़ाने आज,   
वह खुद महफिल मे आकर बैठे हैं।

अब कैसे पढूं कोई गज़ल,
मुझे फ़िक्र बहोत है,
के हर एक नज़्म मे उनका
ज़िक्र बहोत है।

पढ़ते पढ़ते उनका
कहीं नाम आ जाए,
भरी महफिल वह हमसे
बदनाम ना हो जाए।

ए खूदा एक दरखास्त है,
के मेरी हर नज़्म-ए-गजल मे उनसे
इशारों मे बात होती रहे,
महफिल रहे अंजान,
और दो दिलों की मुलाकात होती रहे।

जरा रहमत रखना खुदा मुझपे,
अगर ग़ज़ल मे इज़हार हो जाए,
वह ना करे कोई महफिल से पर्दा,
मुझसे मोहब्बत का इकरार हो जाए।
commented by
lovely piece
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Thanks Priya ji

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