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आज सड़क पर देखकर भी; 

भूखे गरीब बेबस बेबस बच्चो को, 

दिल पसीजा नहीं जाता, 

हर गली पर देख फ़क़ीर एक; 

कदमो को खींचा अब नहीं जाता, 

शायद मर गयी है आत्मा मेरी; 

या शायद इसे बड़ा होना कहते है 

जब अपने पैरो तले; 

धूल छुप जाने लगे 

जब अपने पैरों तले ;

 घास कुचली जाने लगे, 

जब ज़मीर मरने लगे; 

और न जीने की आशा हो, 

लोग तमाशबीन बन जाए; 

और दुनिया तमाशा हो. 

आज मरा था कोई सड़क पर; 

और मैं रुका भी तो इसलिए, 

कि जाने इतना ट्रैफिक क्यूँ है 

ट्रैफिक छंट गया और निकल गया मैं, 

अपने साथ अपने ज़मीर को भी; 

कहीं दूर छोड़ आया मैं, 

शायद अब मैं, बड़ा हो गया हूँ....

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superb lines...
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Accha likha hae veere .
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dhanyawad navjyot ji!!
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thanks a lot gurjyot bhai!!
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excellent....keep writing

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