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फिर से एक आंसू चला है

अपने वजूद की वजह ढूंढ़ने

अपने गिरने की सजा ढूंढ़ने

फिर से एक आंसू चला है

की उसका कुसूर था बस ये

की वो सबकी हंसी चाहता  था

खुद गिरकर भी हमेशा

सबकी सलामती, ख़ुशी चाहता था

पर जिंदगी को शायद ये मंजूर न था

कोई नेक दिल रह जाये जहाँ में

ये ख्वाब में भी  हो

ऐसा जहाँ कुबूल न था

फिर हर कोई आकर उसे

जिंदगी और उसके रिवाज बताता रहा

वो फिर भी खुद पर यकीन  रख

अच्छे रहने की वजह चाहता  रहा

पर वो पत्तर बन उसे मान न देते

जब तो गिरता तो हँसते या ध्यान न देते

वो आंसू टूटता रहा

खुद की अच्छे से छूटता रहा

फिर वो आंसू सूख जाने को है

इस दुनिया से एक अच्छाई जाने को है

कल वो आंसू न होगा, सब गिरे हुए बदतर होंगे

कोई इंसान न होगा, सब पत्थर होंगे
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a mirror to future....!!
very well composed....
such a meaningful and really nice poem....
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-------------
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Thanks Ritika ..glad you liked it :)

@Alihanzala12... :)
commented by
superb....

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