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दिखावटी रिश्तो के बीच ऐसा
लगने लगा है
कि खुद के साथ जो रिश्ता है मेरा
वो भी एक दिखावा है
इन रिश्तो में जमी धूल
को क्या साफ़ करना
उस धूल भरे आईने में
जो अक्स दिखता है मेरा
वो भी तो एक दिखावा है.

घर में शोर ज्यादा है
बातें कम होती है
सुनकर ताने रोज़ रोज़ के
दीवारे भी रोती है
खुला है कमरा बहुत हवा है
फिर भी दम घुटता क्यूँ है
सारे बंधन टूट चुके है
फिर भी जाने ये रिश्ता क्यूँ है.

कहने को घर में रहते
और पूरा परिवार है
फिर भी लगता हर ज़र्रा खोखला
हर कोई यहाँ बीमार है.

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shared Feb 23, 2016 in Poem by Snigdha Jha
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