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बेकार ही लतीफे हमने उन्हें सुनाए मियाँ

वो हँसती गईं, हम कम्बख्त फँसते गए।

इस मक्कार इश्क़ ने दिवालिया निकाला हमारा

पकड़ लिया हमे बाग में उनके साथ इश्क़ लड़ाते हुएवो तोहफे सँभालती गईं,हम कम्बख्त उधार में धँसते गए।

वो तो अब्बा के साथ हो ली,कम्बख्त हमपे डंडे बरसते गए।

इन मक्कार दोस्तों की क्या बात करूँ, कहा था ध्यान रखना

इधर हम पीटते गए,कम्बख्त एक-एक करके खिसकते गए।

सुन फराज़ को हमने भी अपने हुनर को तराशा

हमे तो शायरी अच्छी लगी,कम्बख्त ये दोस्त हँसते गए।

आज सोचा था जी भर कर उठाएँगे उनके नाज़ औ नखरे को

जिक्र जो पुराने आशिक़ का हुआ,कम्बख्त दाँत पिसते रह गए।

आज तो निकाह का पूरा इरादा कर लिया था हमने

उसने कहा रिश्ता तय हो गया है हमारा,कम्बख्त ये बात कानों को डसते गए।

आज काफी दिन बाद दिखी वो गली में अपने मुन्ने के साथ,कहा देखो मामा

काहे के मामा,वो अपने रास्ते गए,कम्बख्त हम अपने रास्ते गए।

 ©yugesh kumar

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loved the poem... :)
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Thank you :)

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