This website is in read only mode. To be the part of New YoAlfaaz community, click the button.
+5 votes
53 views
shared in Ghazal by
यूं ही कट गयी तमाम ज़िन्दागी सुलझाने-सुलझने में
कभी दुश्मनों से उलझने में कभी दोस्तों से सुलझने में

मुश्किलों को देख कर मुझे हकलाना नही मन्ज़ूर
शान बडी है, ए-जहान मेरी, यूंही बे-ख़ौफ चलने में

मेरे साथ कदम मिला के कभी दो कदम तो चल
क्या मज़ा रक्खा है यूं ज़माने के साथ साथ चलने में ?

अब देखता हूं, तो सोचता हूं, ये दुनिया कितनी बदल गयी
ख़ुद को छोड कर मसरूफ रहा मैं दुनिया बदलने में

मैं सूरज नही, मैं चिराग़ नही, मैं जूगनू भी नही
सज़ा मग़र है मुकम्मल मेरी यूंही दिन रात जलने में

ए-शम्स, कभी मेरे साथ बैठ ज़रा, दो बातें भी तो कर
क्या ग़रज़ पडी है तुझे सुबहा निकलने और शाम ढलने में ?

क्यूं बेचैन है "अनिल" गर उसे वक्त लगा तेरे पास आने में
वक्त तो लगता ही है अक्सर किस्मत की लिखावट बदलने में

तुझे भी समझ लेगें फ़िर कभी फुर्सत से ए-ज़िन्दगी !
अभी मसरूफ हूं ज़रा मैं ख़ुद को समझने में

शम्स=सूरज
commented by
Bohat khoob ghazal kahi hai aapne anil ji

Zor-e-kalaam aur ho
commented by
Dhanywaad Bhai Ji...
commented by
very nice ghazal :) :)
Anil.. :)
commented by
Dhanywaad Bhai....
commented by
loved the poem... superb lines...
commented by
Thanks Veere ...

Related posts

+6 votes
0 replies 187 views
+5 votes
0 replies 88 views
+3 votes
0 replies 40 views
Connect with us:
...