This website is in read only mode. To be the part of New YoAlfaaz community, click the button.
+3 votes
34 views
shared in Poem by
उन गलियों में मंजिल अपनी

पाउँ कैसे

गुमनाम रास्तो में फिर से

जाऊ कैसे

रात ढल रही है

कोई रौशनी नहीं है

रात अमावस है

चांदनी नहीं है

दीयो की लौ इतनी नहीं कि

मेरे घर को रात भर जला सके

तारो में भी कहाँ है आग

कि सोयी सुबहो तो रात तक जगा सके

पानी नहीं है खुली रखने को आँखें

आंसू से काम चलाता हूँ

आंसू जब सूख जाते है

तो अँधेरे में सो जाता हूँ

वो रास्ता अभी तक अधूरा है

वो मंजिल अभी नहीं आई है

जो मुझसे आगे दिखती है मुझको

वो सिर्फ मेरी परछाई है
commented by
very nice :) :) :)
commented by
very well written...
commented by
thanks a lot tushar!!
commented by
thanks a lot gurjyot ji!!

Related posts

+2 votes
0 replies 22 views
+4 votes
0 replies 41 views
+6 votes
0 replies 38 views
+3 votes
0 replies 25 views
+1 vote
0 replies 27 views
+6 votes
0 replies 39 views
+3 votes
0 replies 50 views
+4 votes
0 replies 37 views
shared Jun 9, 2018 in Shayari by arohiinayat
+3 votes
0 replies 19 views
+5 votes
0 replies 50 views
Connect with us:
...