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कब से रस्ता देख रही हूं तेरा मैं विराने में

और कितनी देर लगेगी राम तुम्हारे आने में
 
कितने वर्ष यूं बीत गये हैं इसका कोई ज्ञान नही

कौन तिथि है, कौन वार है ये भी तो अनुमान नही

अब भी कोई कसर रही क्या मेरे व्य्था सुनाने में

और कितनी देर लगेगी राम तुम्हारे आने में


बिन सोचे बिन समझे उन्होने मुझ में दोष निकाल दिया

छोड के उस अधर्मी सुरपति को मुझ पे रोष निकाल दिया

कुछ तो मुझ से पूछा होता, कुछ तो करते बात कोई

क्षणिक क्रोध में तपकर मुझे यूं पत्थर में ढाल दिया

अब पश्चाताप में जलते हैं रो रोकर मुझे मनाने में

और कितनी देर लगेगी राम तुम्हारे आने में


पत्थर की मूरत हूं प्रभू जी, लेकिन हृदय तो दुखता है

मुझको कोई देख सके ना पर मुझे तो सब कुछ दिखता है

जब तक तुम न आओगे मृत्यु भी न आएगी

कब तक ऐसे जीए जांऊ मैं, कब तक यूं जी पांऊंगी

और कितना समय लगेगा मेरे प्राण बचाने में

और कितनी देर लगेगी राम तुम्हारे आने में


सर्दी गर्मी और वर्षा ऋतु मुझको बडा सताती हैं

मेरे अश्रु सींच सींच कर धरा उपवन हो जाती है

कलियों पे भंवरों की गुंजन मुझको क्रोध दिलाती है

ऋतु बसंत की भिनी खुशबू मुझको अब नही भाती है

अब किस बात की देरी है प्रभु मेरे कष्ट मिटाने में

और कितनी देर लगेगी राम तुम्हारे आने में


औरों की भांति क्या तुमको भी दिखता है मुझमे दोष कहीं

भूख प्यास से व्याकुल अब मैं खो न जाऊं होश कहीं

जितनी देर लगाओगे प्रभु मुझमें दोष बढ जाएगा
 
कब तक चित को शांत रखूं मैं मुझमें रोष बढ जाएगा

अब कोई देर लगाओ न प्रभु मुख चितचोर दिखाने में

और कितनी देर लगेगी राम तुम्हारे आने में


और कितनी देर लगेगी राम तुम्हारे आने में .....
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Bahut hi Khoobsurat hai
Bahut khoob
commented by
Thank you Brother...

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