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कभी कभी रास्ते 
कुछ यूँ भटक जाते है
तलाश है किसी और की
कोई और ही मिल जाते है
वो पिंजरे के इस पार से
आवाज़ लगाते फिरते है
हम पिंजरे के उस पार से
आवाज़ में बंध जाते है
वो आवाज़ नहीं है आज
ख़ामोशी चुभती है
एक फूल की कमी से
ये क्यारी चुभती है
मिटटी में दफन होकर भी
ख्वाबो में आती हो
कभी आवाज़ देती हो
कभी हमें जगाती हो
खाने के समय मेज़ पर
जब तुम नहीं दिखती हो
न उड़ती हो तुम कमरों में
न कंधो पर बैठती हो
तब एकांत का क्षण
वास्तव में एकांत हो जाता है
एक आवाज़ नहीं होती
सब शांत हो जाता है।

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i love it.....
:):) bhut nice
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thanks a lot ritika ji!!
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====वाह जनाब वाह====
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dhanyawaad bahut bahut!!
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very nice :) :)

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shared Apr 19, 2018 in Shayari by arohiinayat
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