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जब सांसों का साथ नहीं छोड़ा हमने, 
तो तुझे पाने की आस कैसे छोड़ दे , 
जिन्दा रहकर हम 
अपनी ज़िन्दगी को जीने का एहसास कैसे छोड़ दे । 
लोग क्या समझेंगे दिल के सच्चे रिश्तों को, 
क्यों टूट कर भी तेरे इन्तेजार को धड़कता है दिल, 
क्या बताएं अब हम इनको, 
दिल से दिल से होती है जो हममे, 
हम इनको वो बात कैसे बोल दें, 
जिन्दा होकर हम 
जीने का एहसास कैसे छोड़ दे ।
हाँ है हम काफिर 
तो आम होकर क्या करना है, 
तेरे इन्तेजार में दम छूट जाये मंजूर है, 
पर समझौते कर के हमें किश्तों में नहीं मारना है, 
साँसों में धड़कता है तू , 
तो बोलो हम वो सांस कैसे छोड़ दे, 
ज़िंदा हकीकत हम 
तो ज़िन्दगी का एहसास कैसे छोड़ दे ।।

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Loved it a lot!!!!!!
Really really gud!!
Well written!!!
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Thanks alot Pranayeee :D
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loved it!
too good
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lovely poem.. very nice...
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Thanks Priya ji :)
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Thanks Gurjyot bhai
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bas yaar.. rulayega kya..
तेरे इन्तेजार में दम छूट जाये मंजूर है,  
पर समझौते कर के हमें किश्तों में नहीं मारना है, ufff these lines..
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thanks Viro bhai, really appreciated .. :)

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