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कहते हैं के जब जैसे जैसे इंसान बड़ा होता जाता है समझदार, सलीन और सामाजिक होता जाता है। दिमाग के विकाश और समझदारी से वो हर एक चीज को अछे से समझता है, अनुभव करता है और उस हिसाब से फैसले लेता है । वक़्त और दिमाग दोनों का तजुरबा होता है उसे और इसमे कोई दो राय नहीं के बड़े होने से समझदारी आती है ।
है ना ?
फिर ये कैसी समझदारी है जो रिश्तो की अहमियत भुला देता है, उसे निभाने और समझने का हुनर और कोशिश दोनों खत्म कर देता है ।
जिस भाई को बचपन मे कोई छु भी लेता या आंखे दिखा देता उसे हम मरने को पीटने को उतारू हो जाते थे , बिना ये देखे ये समझे की गलती हमारे भाई की भी हो सकती थी, पर हमे तो बस हमारा भाई दिखता था और कोई उसे कुछ कर ले ये हमे कहा गवारा था । जिस भाई के साथ हम अपनी रोटी का आधा हिस्सा, अपने कपड़े से लेकर बिस्तर सब बांटते थे । हमेसा उसकी जरूरतों को खुद से आगे रखते थे , बस भाई खुश रहे ये सोचते थे । और आज हर जरूरतों के लिए उसे मारने और सुनाने को उतारू । घर के खाने से लेकर, जमीन के टुकड़े से लेकर, कमरे के हिस्से तक, वही प्यारा भाई हुमे कैसे खटकने लगा। ये मेरी तुम्हारी वाली सोच कब आ गयी इस प्यार के बीच मे ?
हम भी वही है और भाई भी वही, फिर क्या बदला ? नए रिश्ते आने से क्या पुराने रिश्ते की अहमियत खत्म हो गयी ?
जो बहने सबसे अछि दोस्त हुआ करती थी, दुख सुख मे साथ दिया करती थी । रसोई का खाना छुपा कर देने से लेकर , पिताजी की डांट तक से बचाती थी । राखी मे पैसे न होने से ये बोलती थी के रहने दे भाई तू है न और क्या चहये मुझे, जिस दिन कमाना सब वसूल कर के लूँगी। जो रक्षाबंधन मे हमारे न होने से रोती थी, जिसके लिए दोनों भाई आँख के दो तारे हुआ करते थे  । आज ऐसी हो गयी के उनके पास भाइयो के लिए भी वक़्त कहा बचता है । जिनके जुबान से मेरा शब्द भी नहीं निकलता था , आज उन्हे खुद के हिस्से तक दिखने लगे । जिनके लिए अब रक्षाबंधन बस एक त्योहार बानकेर रह गया, और भाइयों मे अंतर दिखने लगा । ये बदलाव कब आ गया, ये सोच कब आ गयी ?
जिस माँ बाप ने जन्म देने से लेकर बड़ा खुद के बच्चे होने तक तुम्हारा साथ दिया । तुम्हारी जरूरते पूरी की, तुम्हारी हर मुसीबत से रक्षा की। जिस माँ की गोद और बाप के कंधो से बाहर हम खुद को कभी सोचते नहीं थे , आज बोझे कैसे लाग्ने लगे ?
जिनहोने अपनी पूरी ज़िंदगी हमपे लगा दी , आज हमारे पास उनके लिए वक़्त कैसे नहीं है ?
जिनकी हर दौलत हम थे आज हमारी ही नजर उनकी दौलत पर कैसे , और मतलब से कैसे ?
इतने बड़े हम कैसे हो गए, इतने समझदार हम कब हो गए के रिश्तो को बस रिश्ते समझने लगे ? रिश्तो के दायरों से बाहर निकाल कर खुद के बारे मे सोचने लगे, खुद के परिवार के बारे मे सोचने लगे ।
आज हम बचपन के हर रिश्तो को भूल कर अपने रिश्तो पर ध्यान देते है, और ये उम्मीद करते हैं के हमारे खुद का परिवार हमे आगे जाकर सुख देगा, एक अच्छा भाई, एक अच्छा बेटा बनेगा, तो एक बार फिर से सोचिए, के आप क्या बन गए ?
बड़े होते होते इतने समझदारी जब आप मे आ गयी तो उनमे क्यू नहीं आएगी ?
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impressive...........................
amazing................................
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Thanks Ritika
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very nice....keep going

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shared Jul 20, 2017 in Essay by Aakinchan jain
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