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औरतें

घरो में औरतें
दर्शको सी होती है,
वो देखती हैं, सुनती हैं,
जिंदगी को ठेलती हैं,
बाजारों में औरतें
ईश्तिहारो सी होती है,
सजी- संवरी चलती हुई,
हर नजर को झेलती है,
किताबो में औरतें
गज़ल जैसी होती है,
कलम की लिखावट में
वो मिटती और रचती है,
सड़क पर औरतें
शिकार जैसी होती है
किसी की वहशी भूख का
वो निवाला बनती है,
औरतें कहां कभी औरतों सी होती है,
हां, ख्यालो में वो खुद के,
वो औरतें ही होती है.

© हरदीप सबरवाल.
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soooo....gudd
reallly nice
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Thank you so much Ritika
commented by
बहुत बढ़िया रचना
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bahut khoob Hardeep Sir....badiya
commented by
Thanks a lot Ranjan Sir
commented by
Thank you so much Priya

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