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कतरा कतरा आंसू के साथ
प्यार भी बह जाता है;
और फिर जाग उठता है इश्क नया
जब तेरा चेहरा नज़र में आता है,

मेरे गुरूर की लड़ाई थी मुझसे
मेरा अहं इश्क से जीत गया
मैंने कुछ कहा नहीं
उन्होंने कुछ सुना नहीं
ख़ामोशी का ये आलम
ख़ामोशी से बीत गया

कहीं पन्ने भरे पड़े है
अनजाने अल्फाजो से
कहीं महरूम है दिल की बस्ती
उस दिल की आवाजों से
स्याही बड़ी सख्त है वक़्त की
इसका दाग जाता नहीं
हम इंतज़ार में रहते है
और उनका जवाब आता नहीं

जानता हूँ मेरे शब्द अधूरे
अल्फाजो में जान नहीं है
जानता हूँ लेकिन तू भी
मतलब से अनजान नहीं है
कभी कभी अल्फ़ाज़ सब कुछ
बयान नही कर पाते है
आवाज़ें होती नही और
काग़ज़ कोरे रह जाते है
उन खाली काग़ज़ो मे बयान एक कहानी है
चाँद लफ़ज़ो में सिमटी हुई सी
ये मेरी ज़िंदगानी है

दिन में पहरा बहुत यहाँ है
रुक जाओ पल भर रात तो हो x
खामोश नज़रो से ही सही
कोई बात तो हो
है गमजदा सी धड़कने
इसमें कोई आवाज़ तो हो
कैसे जानेंगे हम
किसी के दिल का हाल
पहले हमको पता
खुद अपने दिल का हाल तो हो....
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Great....
Awesome composition
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thanks a lot!!
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loved it....awesome
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thanks a lot mam!!
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Loved the emotional quotient of this piece. Simple yet thoughtful................
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thanks a lot saurabh!
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Nice written .. बहुत खूबसूरत

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