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ये वक़्त कैसा अभागा है 
इसे छोड़ के जाना पड़ता है
ऐसा भी कोई वक़्त तो होगा
जब वक़्त ने किसी को चाहा होगा
पर वक़्त बड़ा ज़ालिम प्रेमी था
दो पल का इसका साथ रहा
फिर नयी राहो मे निकल गया
अधूरी रह गयी प्रेम कहानी 
बस खाक ही उसके हाथ रहा

सोचता हूँ कभी, ये वक़्त 
किसी की विरह मे भटक रहा है
वक़्त तेज़ी से गुज़र रहा है
किसी आँगन रुकता नही
किसी गली ठहरता नही
ढूँढ रहा है खोया प्यार
एक दर्द अपने साथ लिए
पूरी करने अपनी कहानी 
खोज रहा है वो गली
जहाँ पर छितरे पड़े है 
वक़्त के पैरों के निशान

ओ सनम मेरी देख तो 
छोड़ जाता हूँ अपने निशान 
वहां तेरे दिल में 
एक दिन थक हार के 
लौटूंगा ज़रूर तेरी गली 
अभी जाने दे मुझे 
वक़्त हूँ मैं
मेरे पास वक़्त नहीं......

इसलिए गुज़र जाता है वक़्त

किसी अंजान मंज़िल की ओर
जा रहा है निरंतर 
और रास्ता बेहद लंबा है
जानता है वक़्त ये बात
इसीलिए तो चलता रहता है
और उसका प्रेम 
वक़्त की देहलीज पर
इंतज़ार में बैठा है....

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super amazing....one of your best poems...
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thankyou very much. this poem is very close to my heart

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shared May 5, 2017 in Poem by ROZER JOSEPH
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