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शायद कहीं खो गया हूँ में,
उजालों को छोड़कर,
अँधेरे की परछाई में कहीं,
सो गया हूँ में | 

क्या करूँ क्या न करूँ,
गुमनाम रास्तों में |
चैन नहीं बिल्कुल मुझको,
न दिन में न रातों में | 

तलाश में खुद की,
बहुत दूर निकल आया हूँ |
सारे चाहने वालों को अपने,
खुद से दूर कर आया हूँ | 

उनका प्यार भी एक धोखा ही था,
जो जरूरतों के साथ बदलता गया |
चोट इतनी तेज लगी है दिल पर, 
कि इससे अब प्यार का अरमान निकल सा गया | 

क्या मैंने ठेका ले रखा है,
दूसरों को मनाने का |
प्यार में झुकना कोई बुरी बात नहीं, 
पर एक मौका तो दिया होता मुझे अपना प्यार जताने का | 

कोई नहीं दिखता सच्चा यहाँ, 
सब नकाब पहने बैठे हैं |
पत्थर तो फेंक दिया उन्होंने मेरे घर पर,
लेकिन क्या वो भूल गए, वो खुद शीशे के घर में रहते हैं | 

©~KK~©

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awesome Vicky...keep going

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shared Sep 18, 2015 in Poem by Ashutosh Dixit
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