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जाने क्यूँ उन रास्तो पर मैं

बार बार लौट का आता हूँ

तन्हा निकलता हूँ घर से

और तन्हा ही लौट आता हूँ

याद है या पिंजरा कोई

भीतर  ही फँस जाता हूँ

कमल तोड़ता हूँ यादो के

और कीचड में धंस जाता हूँ.

कुछ भूल गया था रस्ते मे

या ढूँढ रहा हूँ  मंज़िल अपनी

बार बार पलट के देखता हूँ

कुछ तो है इन यादो में

दर्द में चीत्कारों में

अनदेखी दीवारों में

कोई एक पल ये खोजता है

कितनी अजीब सी बात है

क्या अजब फ़साना है

याद करनेको बस एक पल

और भूलने को ज़माना है

एक बात भूलने के लिए

सौ बाते याद करनी पड़ी

कितनी किताबें पढ़ डाली

कितने हमने यत्न किए

वो टीस अभी तक गयी नही

वो पीड अभी तक गयी नही

वो पीड मितान्ने वो दर्द भुलाने

हम याद खोजने निकले है

हँसी का एक पल दो चाहे

आंसू की एक बूँद मिले

आँखे खुल जाए हकीक़त में चाहे

यादो की मीठी नींद मिले

ये सोचकर चल पड़े है

ढूँढने को याद उस पल की

जहाँ छुपा है दर्द का दरिया

जहाँ बसती है प्यास इस दिल की
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beautiful post... loved it...
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beautiful piece....

Welcome to YoAlfaaz :)
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i like the rhyme of the poem..nice concept.... :)
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thanks a lot!!
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thank you very much!!

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shared Feb 5, 2016 in Poem by saurabhpant94
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