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उम्मीद मे हूँ के पतंगा कोई उमड़ पड़े सैलाब से

आबोहवा मुमकिन करे और तू निकल पड़े ख्वाब से

कायम है तू सीने मे पर, ढकी है जूस्तजू, नक़ाब से

माहताब तक रक़िब हुआ, जबसे तेरी आरज़ू की है, रात से

इतना दिलचस्प ज़माना होगा, सोचा ना था मैने, कभी ये

नकारता रहे आशिक़ों को, और जानिब रखे लम्हात मे

अब क्या वास्ता ब्त्लाउन, कैसे बेरूख़ी रखूं, हालात से

ख्वाब-ए-मुस्ताक़बिल रहे आशिक़, दिखे हर इक बात से

बदोलत किसकी, मुसलसल हुए थे तुम हमसे, मुलाक़ात मे

सवाल एक है सीने मे, के कब होंगे मुकम्मल, काइनात मे

क्या होगा अगर दिल, किसी और के हवाले किया होगा उसने

जवाब देहि किसकी होगी गर पह्न चुकी होगी चूड़ी हाथ मे

ढूँडने निकला हू इस दर्र से उसको, फिर दहलीज लांगी है

के है जिंदा तो क्यूँ नही मिलता मूज़े तू दरख़्वास्त से

गर्दिश मे हैं सितारे हमारे छोड़े आजमाना हमको

ज़माने से कहो रूबरू करे मुझे मेरे अक्स से एहसास से

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After reading your Hindi write-ups, I am planning to try my hands with Hindi poems too :)
Let's see... :P

well written :)
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Sure you should... if you have trouble with meanings look on rekhta(dot)org... i use that very often... thank you for the like :)
commented by
very well written... liked it...
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Thank you Gurjyot :)

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