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मुझसे ग़ज़ल की वो हवा नहीं चलनी;
अश्क स्याही से ग़ज़ल नहीं बननी;

किसी पत्थर जैसे राहों में पड़ा हूँ;
राह मार ठोकर भी आसां नही बननी;

चाहे सितारों को ज़मीं पे उतारो;
तेरे नूर के आगे उनकी नहीं चलनी;

है सजी दुल्हन सी मौत खड़ी आगे;
अब माल-ओ-ज़र से भी काया नही बचनी;

'मजबूर' बस सुखी कुल ज़माने में वो;
दिल मोह में जिसने किया नहीं छलनी;
गौरव मजबूर

अश्क: आँसू

माल-ओ-ज़र: धन दौलत

काया: शरीर
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Ovation, CLAPSSSSSSSSSSSSSSSSSSSSS
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thanks sheela :)
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mind-blowing Gaurav....amazing :)
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thanks priya :)

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